hindi shayari

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महबूब वादा करके भी ना आया दोस्तों 
ना जाने क्या क्या कर दिया हमने उसके प्यार में 
मुर्गे चुरा के लाए थे जो चार पॉपुलर 
दो आरज़ू में कट गये दो इंतज़ार में
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तकदीर से बड़ा है मुकद्दर से लड़ा है
दुनिया कहती है चालाक बड़ा है
ख़ुद तीस का है और दुल्हन साठ बरस की
गिरती हुई दीवार के साए में खड़ा है
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कपड़ों के आबोताब दिखाने में रह गया
खूबसूरतों को लुभाने मैं रह गया 
मुर्गे कि टांग खा गये बारात में सारे लोग
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
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राज़ जो कुछ हो बता भी देना 
हाथ जब उनसे मिलाना तो दबा भी देना
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दिन ढल गया रात गुजरने की आस में
 सूरज नदी में डूब गया हम गिलास में
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ग़ुरबत से बाप इस कदर मजबूर हो गया 
बेटा किताब छोड़ के मजदूर हो गया
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बच्चे किसी ग़रीब के आपस में में लड़ गये
सिक्का ज़मीं पे वो गिरा के अच्छा नहीं किया
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तुम मेरे अलावा दो चार सनम रखना
मासूम बने रहना आँखों को नम रखना 
ये कहकर मुझे बीवी ने घर से निकाला 
जब काट सको जेबें तब घर में कदम रखना
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वो आए और रखे ना कोई भी फूल मेरी कब्र पर
हम तो वैसे ही गमे हसरतों का बोझ लिए जा रहे हैं
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कैसे कटी है रात कोई जानता नहीं 
मेरे दिल की ये बात कोई जानता नहीं
किसके खून से मिली थी उसे ज़िन्दगी
उस खून की क्या थी ज़ात कोई जानता नहीं
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